Published On : Fri, May 21st, 2021

खदानों की नीलामी व मज़दूर विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ श्रमिकों में आक्रोश

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– अंग्रेजों से भी अधिक दमनकारी है मोदी सरकार

नागपुर/रांची: देश की सभी कोयला खदान श्रमिक संगठनों ने सरकार की श्रमिकों बिरोधी नीतियों के खिलाफ़ आक्रोश व्यक्त किया है कि अंग्रेजों से भी ज्यादा दमनकारी है ये मोदी सरकार।उन्होंने बताया कि झारखंड प्रदेश की 41 कोयला खदानों सहित छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश,आंध्रप्रदेश,महाराष्ट्र,और उत्तरप्रदेश समेत कुल 67 कोयला खदानो की कमरशियल नीलामी को लेकर कोयला श्रमिक जनता मे मोदी सरकार के बिरोध में आक्रोश जता रही है। मोदी सरकार की मज़दूर विरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ कोयला हड़ताल असरदार रही है। इसके समर्थन में सभी केन्द्रीय मज़दूर संगठनों द्वारा आहूत राष्ट्रव्यापी विरोध में देश के विभिन्न राज्यों के अनेक शहरों में आन्दोलनकारी सड़कों पर उतर रहे हैं।

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कोयला संगठनों की माने तो कोल इंडिया की अनुसंगी ईकाई सीसीएल व बीसीसीएल की झारखंड स्थित लगभग सभी कोलियरियों में कोयला मज़दूर यूनियनों के तीन दिवसीय प्रतिवादी हड़ताल को ज़ोरदार ढंग से सफल बनाने की ख़बर है। उधर कोयलांचल की राजधानी कहे जाने वाले धनबाद की मुगमा–कुमारधुबी समेत कई अन्य कोलियरियों के कोयला मज़दूरों का मानना है कि कंपनियों से यारी और मज़दूरों से गद्दारी नहीं चलेगी’ के नारे लगाते हुए कोलियरियों के गेट पर विरोध प्रदर्शन किया है।

कोयलांचल के ही बोकारो जिला स्थित गोमिया–बेरमो के अलावे रामगढ़–हजारीबाग जिलों के सीसीएल की आरा,कुजू ,सिरका व गिद्दी कोलियारियों में व्यापक मज़दूरों मे आक्रोश व्याप्त है । उक्त इलाके के चर्चित मज़दूर नेता कोल माइंस वर्कर्स यूनियन के बैजनाथ मिस्त्री ने केन्द्रीय कोयला मंत्री द्वारा कोयला खदान नीलामी को आत्मनिर्भर भारत के लिए नयी उम्मीद कहे जाने को देश के कोयला मज़दूरों की साथ साथ जनता के साथ खुली गद्दारी कहा। साथ ही यह भी बताया कि जिन कोयला मज़दूरों ने संसदीय चुनाव में नरेंद्र मोदी की देशहित के जुमलों में फंसकर बढ़ चढ़ कर उन्हें वोट दिलाने मे उनको समर्थन दिया था परंतु आज वे अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहें हैं।जिन्हे श्रमिकों ने हीरा समझा अब वे जीरा-जीरा साबित हो रहे है।उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जमाने मे निजी कोलियरियों और उनके मालिकों के अमानवीय शोषण और गुलामी भरा जीवन आज भी यहाँ के लोगो को एक दु:स्वप्न की तरह पूरी तरह याद है।

उन्होने बताया कि मोदी सरकार द्वारा कोयला उद्योग को घाटे से उबारकर व्यापक लोगों को रोज़गार देने की बात पूरी तरह से झूठ साबित हो रही है? क्योंकि अधिकांश कोलियारियाँ लगातार राष्ट्र को मुनाफ़ा दे रहीं हैं। ऐसे में इनका निजीकरण होने से काम धंधा छूट जाने और निजी खदान मालिकों द्वारा श्रमिकों मे बन्धुवा-गिरी थोपे जाने से स्थिति से जनता काफी चिंतित हैं। इसलिए सारे कोयला मज़दूर मोदी सरकार से आर पार की लड़ाई का मन बना रहें हैं। कई कोलियरियों में इस बार उनसे ऊपर स्तर के कर्मचारियों के भी हडताली मज़दूरों को समर्थन देने की खबर है। बरकाकाना स्थित केन्द्रीय वर्कशॉप के हड़ताली कोयला मज़दूर प्रतिनिधियों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि राष्ट्र के औद्योगिक विकास के नाम पर हमारे पुरखों से ज़मीनें छीनकर और हज़ारों–हज़ार आदिवासी – मूलवासी रैयत किसानों को विस्थापित कर कोलियरियाँ बनायी गयीं। अब उसे औने पौने दामों पर निजी कंपनियों के हवाले किया जाना, सरासर देश की जनता-जनार्दन के साथ सरासर चापलूसखोरी-धोखाधडी-बेईमानी और विश्वासघात माना जा रहा है।

कोयला क्षेत्र के निजीकरण के ख़िलाफ़ कोयला मज़दूरों के हड़ताल के समर्थन में झारखंड के सभी वामपंथी दलों व संगठनों ने विगत 3 जुलाई को झारखंड के राजभवन के समक्ष संयुक्त प्रदर्शन किया था। अभियान का नेतृत्व कर रहे वाम पार्टियों के नेताओं ने मोदी शासन पर आरोप लगाया कि लॉकडाउन बंदी और कोरोना महामारी से उपजी भुखमरी–बेकारी–महंगाई की मार की आफत से जनता को निजात दिलाने की बजाय सरकार इसका नाजायज़ फायदा उठाने में ही जुटी हुई है। इस प्रतिवाद में प्रदेश के बैंक व अन्य सेक्टरों की यूनियनों के प्रतिनिधि मज़दूर–कर्मचारियों ने भी आंदोलन मे हिस्सा ले रहे हैं।उन्होंने सभी कोयला खदानों की व्यवसायिक नीलामी रद्द करो अन्यथा मोदी सरकार अपनी कुर्सी खाली करो की मांग दोहराई है।

उधर झारखंड की राजधानी रांची स्थित कोल इंडिया के क्षेत्रीय मुख्यालय दरभंगा हाउस के समक्ष संयुक्त ट्रेड यूनियनों द्वारा विरोध प्रदर्शित कर कॉमर्शियल माईनिंग के नाम पर कोयला उद्योग की नीलामी का कड़ा विरोध किया है।राजधानी रांची स्थित देश के भारी उद्योग संस्थान एचईसी मुख्यायल के समक्ष हटिया मज़दूर यूनियन के तत्वावधान में मज़दूरों ने मोदी सरकार द्वारा सभी सार्वजनिक उपक्रमों को बेचे जाने व कोल माइनिंग की नीलामी के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया है।अनेक श्रमिकों संगठनों ने मो दी सरकार को कसाई सरकार करार देते हुए कहा कि ये गोरे अंग्रेज देश छोड़कर चले गए और अब काले अंग्रेज देश मे राज कर रहे है। उन्होंने गोरे अंग्रेजों से भी ज्यादा दमनकारी ये काले अंग्रेजों वाली मोदी सरकार को दोषी ठहराया है.

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