महाराष्ट्र की राजनीति में अगर बीते कुछ वर्षों का कोई चेहरा निर्णायक बनकर उभरा है, तो वह है देवेंद्र फडणवीस -भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए देवाभाऊ। नागपुर महानगरपालिका चुनाव में भाजपा की निर्णायक जीत ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि संगठन, रणनीति और नेतृत्व – तीनों की कमान फिलहाल एक ही हाथ में है।
यह जीत सिर्फ एक नगर निगम की नहीं है। यह उस नेतृत्व की जीत है जिसने लोकसभा के झटके के बाद भी घबराने के बजाय रणनीति बदली, ज़मीनी कार्यकर्ताओं को फिर से जोड़ा और संगठन को दोबारा धार दी। विधानसभा चुनावों में दमदार वापसी और अब नगर निगमों में बढ़त – यह राजनीतिक “रीबाउंड” यूँ ही नहीं होता।
चार दशकों तक जिन नगर निकायों पर एक ही परिवार और एक ही राजनीति का दबदबा रहा, वहाँ भाजपा की पकड़ मज़बूत होना इस बात का संकेत है कि शहरी महाराष्ट्र की राजनीतिक धुरी खिसक रही है। मुंबई जैसे दुर्ग में भी भाजपा की रणनीति, संगठनात्मक विस्तार और आक्रामक शहरी एजेंडा यह बता रहा है कि आने वाला समय बदलाव का है – और उस बदलाव के केंद्र में फडणवीस हैं।
देवेंद्र फडणवीस सिर्फ चुनाव जिताने वाले नेता नहीं रहे। वे कैडर-बिल्डर हैं। RSS की शाखा से निकला यह नेता आज न केवल संघ का भरोसेमंद चेहरा है, बल्कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कोर टीम का अहम स्तंभ भी माना जाता है। संगठन में उनकी स्वीकार्यता संयोग नहीं, निरंतर प्रदर्शन का परिणाम है।
“देवाभाऊ” की राजनीति भावनात्मक नहीं, डेटा-ड्रिवन, माइक्रो-मैनेज्ड और अनुशासित है। यही वजह है कि भाजपा का कार्यकर्ता उन्हें सिर्फ नेता नहीं, कमांडर मानता है। हार के बाद चुप बैठने की संस्कृति उनके स्वभाव में नहीं है -वे हार को होमवर्क मानते हैं।
आज महाराष्ट्र गर्व कर सकता है कि उसके पास ऐसा नेता है जो राज्य से आगे सोचता है। संकेत साफ हैं: फडणवीस अब सिर्फ महाराष्ट्र की राजनीति तक सीमित नहीं रहने वाले। राष्ट्रीय जिम्मेदारियों के लिए वे पूरी तरह तैयार दिखते हैं।
देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक कुर्सियों तक पहुँचने का रास्ता लंबा होता है, लेकिन कुछ नेता होते हैं जिनके लिए रास्ते अपने-आप बनते हैं।
देवाभाऊ उसी रास्ते पर हैं।
यह सिर्फ सत्ता की कहानी नहीं —
यह महाराष्ट्र के एक नेता के राष्ट्रीय कद में बदलने की कहानी है।









