Published On : Fri, Jun 13th, 2014

चंद्रपुर को डुबो ही देंगे वेकोलि के मिट्टी के ढेर

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पिछले साल बने थे बाढ़ का कारण

वेकोलि ने जिला प्रशासन को दिखाया ठेंगा

बारिश सिर पर, एक साल में नहीं उठाया कोई कदम


चंद्रपुर

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जिले में नदी किनारे स्थित वेकोलि के ओवरबर्डन को हटाने की मांग पिछले 8 सालों से लगातार होने के बावजूद वेकोलि जिला प्रशासन को ठेंगा दिखा रहा है. जिले में बाढ़ का कारण बने वेकोलि के ओवरबर्डन की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया है. ओवरबर्डन के कारण जिले में पिछले साल चार बार बाढ़ आ चुकी है. सैटेलाइट से लिए गए चित्र में यह साफ हो गया है कि ओवरबर्डन के कारण बाढ़ का खतरा अभी भी बना हुआ है. दो दिन पहले इस संबंध में जिलाधीश कार्यालय में हुई बैठक में ग्रीन प्लेनेट सोसाइटी के अध्यक्ष प्रा. सुरेश चोपणे ने सारे अधिकारियों के ध्यान में यह बात ला दी थी. जिलाधिकारी ने वेकोलि को इस संबंध में फटकार तो लगाई है, लेकिन ऐन बारिश के मौके पर कितना काम इस दिशा में हो पाएगा, यह समय ही बताएगा.

रोजगार देनेवाला उद्योग बना जानलेवा
चंद्रपुर जिले के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका कोयला उद्योग की ही रही है. अनेक लोगों को रोजगार देने वाला यह उद्योग अब लोगों की जान पर बन आया है. जिले में एक-दो नहीं, सैकड़ों खानें कार्यरत हैं, लेकिन इसमें कोयला उद्योग महत्वपूर्ण है. चंद्रपुर शहर से बहने वाली इरइ नदी की गहराई पिछले कई सालों से नहीं बढाई गई है. नदी की गहराई कभी 10 फुट हुआ करती थी, जो आज घटकर 5 फुट रह गई है. वेकोलि द्वारा जगह-जगह नदी किनारे खड़े किए गए ओवरबर्डन (मिट्टी के ढीग) इसके पीछे बड़ा कारण हैं. इतना ही नहीं, अब तो ताप बिजलीघर की राख भी नदी में डाली जाने लगी है. इसका परिणाम यह हुआ है कि कई स्थानों पर नदी का बहाव बदल गया है. वेकोलि ने नदी किनारे केवल इसलिए मिट्टी के ढेर खड़े कर दिए, ताकि उत्खनन में बाधा न पैदा हो. इसी के चलते वर्ष 2006 में चंद्रपुर शहर को बाढ़ की विभीषिका का सामना करना पड़ा था.

जरा सी बारिश ढाती है कहर
आज हालत यह है कि थोड़ी सी बारिश होने पर भी चंद्रपुर के रास्ते बंद हो जाते हैं. इसमें भी माना खान क्षेत्र की स्थिति बहुत ही ख़राब है. वेकोलि के ओवरबर्डन के कारण आरवट, चारवट क्षेत्र में अनेक खेतों में पानी भर जाता है. पिछले साल आई बाढ़ के बाद शहर के निरिक्षण के लिए आए मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने नदी को और गहरा करने का निर्देश दिया था. इसके मुताबिक पर्यावरण विभाग और नीरी ने कार्ययोजना भी बनाई. जिला प्रशासन ने वेकोलि को सुरक्षा दीवार बनाने के निर्देश दिए. साथ ही मिट्टी का ढेर 45 मीटर तक काम करने की सलाह भी दी. संभावना जताई गई थी कि अगर ये उपाय कर लिए गए तो अगले बरस बाढ़ से दो-चार नहीं होना पड़ेगा.

हड़बड़ाकर जागा जिला प्रशासन
लेकिन, वेकोलि ने एक साल में कुछ नहीं किया है. ग्रीन प्लेनेट सोसाइटी के
सर्वे में यह बात खुलकर सामने आई है. इस संबंध में जब अख़बारों में खबरें छपी तो जिला प्रशासन हड़बड़ाकर जागा और एक बैठक बुलाई. बैठक में वेकोलि के अफसरों ने साफ कहा कि ओवरबर्डन से बाढ़ नहीं आती. ग्रीन प्लेनेट सोसाइटी के प्रा. सुरेश चोपणे ने सैटेलाइट चित्रों के माध्यम से साबित कर दिया कि वेकोलि के कारण नदी का कितना नुकसान हुआ है. साथ ही वेकोलि पर्यावरण के नियमों का भी पालन नहीं करती.

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दोनों नदियां हो गईं सपाट
सैटेलाइट चित्रों के अनुसार माजरी से चंद्रपुर तक की इरइ नदी एवं चंद्रपुर से सास्ती तक की वर्धा नदी ओवरबर्डन के कारण कई स्थानों पर सपाट हो गई है. जिला प्रशासन से वेकोलि से इस पर कोई कदम उठाने को कहा है. देखना यह होगा कि इतने कम समय में वेकोलि क्या कदम उठाती है.

2006 में ही हो गया था उजागर
2006 में बाढ़ आने के बाद गठित एक समिति ने स्पष्ट कर दिया था कि वेकोलि के ओवरबर्डन और ताप बिजलीघर की राख के कारण नदी उथली हो गई है. तत्कालीन जिलाधिकारी प्रदीप कालभोर ने इस पर योजना बनाई थी कि कौनसा उद्योग नदी को कितना गहरा करेगा. इसके अनुसार जिले के विभिन्न उद्योगों को निर्धारित चरण में नदी की गहराई बढ़ाने के लिए प्रयास करने चाहिए थे. लेकिन नदी की गहराई तो नहीं बढ़ी, बल्कि कालभोर का तबादला हो गया. नदी की गहराई बढ़ाने का मुद्दा जैसा का वैसा रह गया. एक बार फिर वेकोलि वैसा ही व्यवहार कर रही है. चंद्रपुर के नागरिकों का सवाल जवाब मांग रहा है कि वेकोलि की तानाशाही पर लगाम आखिर कसेगा कौन ?

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