Published On : Sun, Oct 21st, 2012

बबली को मिली जमानत पर कोई सामने नहीं आय – Navbharat


नागपुर. शेयर मार्केट सहित विविध व्यापारिक संस्थानों से …यादा मुनाफा कमाकर देने का लालच देकर सैकड़ों लोगों को ठगने वाले बंटी और बबली (वर्षा और जयंत झामरे) देर से ही सही सलाखों के पीछे पहुंच गए. पुलिस हिरासत के बाद उ‹हें ‹यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. बड़े बुजुर्ग कहते हैं ‘जैसा करोगे वैसा भरोगेÓ ऐसा ही कुछ इन दोनों के साथ हुआ है. ‘बुरे व€त में साया भी साथ छोड़ देता हैÓ यह कहावत भी झामरे दंपति पर सटीक बैठती है. असल में 3 दिन पहले स˜ा ‹यायालय ने बबली को जमानत दे दी लेकिन अब उसके दिन इतने बुरे आ गए हैं कि दोस्त रिश्तेदार यहां तक कि माता-पिता ने भी उसकी जमानत लेने से इंकार कर दिया. यही कार‡ा है कि जमानत पर फैसला होने के बावजूद बबली अब भी सेंट्रल जेल की हवा खा रही है. बचावपक्ष के अधिव€ता ने अतिरि€त स˜ा ‹यायाधीश एम.डŽल्यू. चंदवानी की अदालत में वर्षा की जमानत अर्जी दायर की थी. 17 अ€टूबर को अर्जी पर अदालत ने फैसला सुनाया. 50000 रुपये के निजी मुचलके पर वर्षा को जमानत दी गई. अदालत ने कहा- ‘देश से बाहर न जाएंÓ इसी के साथ-साथ देश न छोडऩे की शर्त भी रखी गई. अदालत से जमानत तो हो गई लेकिन वर्षा को आर्थिक मदद करने के लिए कोई तैयार नहीं है. ‘जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होए.Ó इस बंटी और बबली ने कई लोगों को अपने जाल में फंसाया. मेहनत की कमाई निवेश करवाई और पैसे लेकर चंपत हो गए. यह तो साफ है कि दोनों ने करोड़ों रुपये जमा किए लेकिन पैसे कहां-कहां निवेश किए या छुपाए इस बारे में अब तक कुछ पता नहीं चल पाया है. पैसा होने के बाद भी किसी काम का नहीं है. ‘हमारे लिए मर गई है वोÓ बताया जाता है कि जमानत पर फैसला होने के बाद जब वर्षा के माता-पिता से मदद के लिए गुहार लगाई गई तो उ‹होंने कह दिया कि वर्षा उनके लिए मर चुकी है. उसकी वजह से जो तकलीफें झेलनी पड़ी हैं वही बहुत हैं. जयंता के भाई से भी मदद मांगी लेकिन उसने यह कहकर मदद करने से इंकार कर दिया कि ‘इन दोनों के कार‡ा ही वो आज मुश्किल में आ गए हैं.Ó अब उनसे किसी तरह का वास्ता नहीं रखना है. जयंता और वर्षा के दोस्त या रिश्तेदार कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आए हैं. इस प्रकर‡ा के बाद पुलिस ने बंटी-बबली से जुड़े हर शख्स से पूछताछ की. पुलिस की जांच में कई लोग ƒोरे में आए. कई लोगों को मुसीबतों का सामना करना पड़ा. यही कार‡ा है कि आज कोई उनकी मदद नहीं करना चाहता.