Published On : Wed, Jul 30th, 2014

देऊलगांवमही : पेट भरने के लिए करते हैं तार पर की कसरत


देऊलगांवमही

khyol
पेट भरने के लिए अनेक परिवार व्यवसाय, नौकरी, मजूरी कर अपना गुजारा करते हैं, परंतु आज भी अनेक ऐसे परिवार हैं जिनका गुजारा छोटे बच्चों की मेहनत से होता है. परिवार का पेट भरने के लिए ये बच्चे बचपन से ही पढ़ना-लिखना छोड़कर विभिन्न कलाओं का प्रदर्शन करने लगते हैं. विभिन्न कलाओं के प्रदर्शन से जो कमाई होती है उसी से उनके परिवार का खर्च चलता है. इन बच्चों की तरफ न तो सरकार का ध्यान होता है और न ही उनके माता-पीता का. यही उनके समुदाय की, उनके परिवार की परंपरा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है.

बिना टिकट की सर्कस
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के करणखेड निवासी अभिन राठोड अपने 18 बाल कलाकारों के साथ गत अनेक वर्षों से शहर-शहर, गांव-गांव में अपनी जान की परवाह किए बगैर सर्कस की विभिन्न कलाओं का प्रदर्शन कर रहे हैं. विशेष यह है कि इस सर्कस को देखने के लिए दर्शकों को किसी प्रकार की टिकट नहीं लगती. इन बच्चों के कारनामे देख लोग खुश होते हैं, वाहवाही करते हैं और पांच-दस रुपए उनकी थाली में डाल देते हैं. तो कुछ दर्शक कला का आनंद लूट कर बिना एक पैसा दिए वहां से निकल जाते हैं. परंतु इन कलाकारों को उनसे कुछ लेना-देना नहीं होता. जितना मिल जाए उतने पर ही वे संतोष व्यक्त करते हैं. एक चौक से खेल ख़त्म कर ये लोग दूसरे चौक में अपनी कला का प्रदर्शन करने चले जाते हैं. चौक दर चौक और शहर दर शहर उनका भटकाव और कला का प्रदर्शन लगातार चलता रहता है.

पढ़ने-लिखने की उम्र में कमाई
इस टोली में छह से चौदा वर्ष के कलाकार शामिल हैं. इन कलाकारों की उम्र पढ़ने-लिखने की होती है, लेकिन परिवार की आर्थिक परिस्थिति को देख व माता-पिता को खुश रखने के लिए वे सर्कस में काम करते रहते हैं. एक तरफ सरकार ने शिक्षा के अधिकार के तहत 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा ग्रहण करना अनिवार्य कर रखा है, मगर पेट की भूख इन्हें पढ़ने-लिखने से दूर रखती है.

तार पर की सर्कस.
गौरतलब है कि, इन बाल कलाकारों को जितना मुआवजा मिलना चाहिए उतना मिलता नहीं. इस पर वे असंतोष तो जताते हैं, मगर कोई विकल्प नहीं होने से ये बच्चे मजबूर होते हैं. सरकार से किसी भी प्रकार की मदद नहीं मिलने से पेट भरने के लिए करनी ही पड़ती है तार पर की सर्कस.