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    Published On : Thu, Jul 3rd, 2014
    Vidarbha Today | By Nagpur Today Vidarbha Today

    कलमेश्वर : 6 माह से बीपीएल कार्डधारकों की मिठास गायब


    खाद्य सुरक्षा के नाम पर कम हो गया अनाज


    नागरिकों में असंतोष, 35 किलो अनाज देने की मांग


    कलमेश्वर

    केसरी राशन कार्डधारकों को पिछले फरवरी माह से राशन दुकानों से अनाज मिलना बंद हो गया था, जो अब जून से फिर शुरू हुआ है. दूसरी ओर बीपीएल राशन कार्डधारकों को पिछले 6 माह से शक्कर नहीं मिल पा रही है. इतना ही नहीं, उन्हें मिलने वाला राशन भी कम हो गया है. इससे उनमें सरकार के प्रति असंतोष व्याप्त है. नागरिकों का कहना है कि नई योजना से उन्हें लाभ की बजाय नुकसान ही हो रहा है. उन्होंने बीपीएल कार्डधारकों को पहले की तरह 35 किलो अनाज देने की मांग की है.

    अधिकारियों ने की गड़बड़ी
    राज्य में फरवरी से ही खाद्य सुरक्षा योजना शुरू की गई है. करोड़ों की लागत से प्रारंभ इस योजना के लाभार्थियों के सर्वेक्षण में अधिकारियों और राशन दुकानदारों ने मिलकर गड़बड़ी पैदा की, जिसके चलते केसरी कार्डधारकों को अनाज मिलना ही बंद हो गया था. अभी जून माह से कलमेश्वर तालुका में केसरी कार्डधारकों को 7.20 रुपए प्रति किलो की दर से 6 किलो गेहूं और 9.60 रुपए प्रति किलो की दर से 5 किलो चावल मिल रहा है.

    लाभ कम, नुकसान ज्यादा
    हालांकि इस योजना से पहले राशन दुकानों से बीपीएल कार्डधारकों को 35 किलो अनाज और शक्कर मिला करती थी. इसमें 5 रुपए प्रति किलो की दर से 20 किलो गेहूं, 6 रुपए प्रति किलो की दर से 15 किलो चावल और यूनिट के हिसाब से शक्कर मिलती थी. वहीं केसरी कार्डधारकों को 7.20 रुपए प्रति किलो की दर से गेहूं और 9.60 रुपए प्रति किलो की दर से चावल दिया जा रहा था. परंतु फरवरी से खाद्यान्न सुरक्षा योजना लागू होने के बाद से 2 रुपए प्रति किलो की दर से गेहूं और 3 रुपए प्रति किलो की दर से चावल का वितरण हो रहा है. बीपीएल को जहां पहले 35 किलो अनाज मिलता था, वहीं अब वह कम होकर 5 से 10 किलो पर आ गया है. इससे बीपीएल कार्डधारकों का नुकसान हो रहा है.

    बाजार से खरीदनी पड़ती है शक्कर
    मजे की बात यह कि बीपीएल कार्डधारकों को नवंबर 2013 तक शक्कर भी मिलती थी, मगर पिछले 6 माह से वे राशन की शक्कर का स्वाद नहीं चख पा रहे हैं. इन ग्राहकों को बाजार से ज्यादा मूल्य देकर शक्कर खरीदनी पड़ रही है. नागरिकों का आरोप है कि अधिकारियों द्वारा लाभार्थियों के सर्वेक्षण में की गई गड़बड़ी के कारण ही ऐसा हो रहा है.

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