सत्ता नहीं सत्य का उपासक महावीर बनता है – विधानाचार्य ब्र. त्रिलोक

विधानाचार्य ब्र. त्रिलोक
गोंदिया
क्षमा की जीवंतता, आर्जन की सरलता और धर्म की पवित्रता समझने के बाद जो सामने है वह सत्य है. जीवन संग्राम की आपाधापी एवं अहंकार,ममकार की टकराहट में आज मानव समाज इतना अधिक स्वार्थ से अंधा हो गया है की सत्य का प्रकाश कषायों के बादलों से ढक गया है. जिस प्रकार वर्षाकाल में सघन मेघों से अवृत होने के कारण सूर्य दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार विषय वासना के उमड़ते-घुमड़ते काले कजरारे श्यामल मेघों से आत्म सूर्य आवृत्त हो गया है. उसे जो प्रकट करना ही मनुष्य पर्याय की सार्थकता है. आत्मिक आलोक कभी भी भौतिक प्रकाश पर निर्भर नहीं करता, वरन रोशनी से ज्यादा जगमग आत्मिक आलोक होता है. कोई सत्य जब तक मनुष्य के हृदय में आकर नहीं धड़कता तब तक वह जिवंत सौंदर्य प्राप्त नहीं कर सकता, और वैसे भी सत्य की अनुभूति को शब्दों के वस्त्र नहीं पहनाये जा सकते.
आनंद प्राप्त करने के लिए तुच्छ पदार्थो को छोड़ दो
जैसे मिल के पत्थर मंजिल नहीं है ऐसे ही शब्दों में सत्य नही सत्य की ओर जाने के संकेत मिलते है. जिनको शत्रु दिखाई बंद हो जाता है. वही सत्य की उद्घोषणा कर सकता है. यह ऐसा सत्य है जिसे जान लेने पर हमारे जीवन में प्रगति के द्वार स्वतः खुल जाते है. उक्त सद विचार मानव जीवन की शोभा सत्य धर्म पर प्रकाश डालते हुए ब्र.त्रिलोक ने दिगंबर जैन मंदिर में व्यक्त किये. जीवन में यदि आनंद प्राप्त करना है तो तुच्छ पदार्थो को छोड़ देना चाहिए. क्योंकि व्यर्थ के छोड़ने पर ही सार्थक की उपलब्धि होगी और ऐसा कभी नहीं होता है कि जो सत्य है, शिव है, सुंदर है, परम आनंद है. वह हमसे दूर हो, हम ही उससे दूर चले जाते है. सत्य का उपासक वही है जिसके लेन देन में संतुलन है.

असत्य सत्य के कपडे पहनकर भले ही कुछ मनमानी कर ले, सिंहासन पर बैठ जाये, पर सत्य शूली को भी सिंहासन बना देता है और असत्य सिंहासन पर भी शूली के दुःख भोगता है. सत्यस्वरूप राजा हरीशचंद्र को भले ही बाजार में बिकना पड़ा हो. पर सत्य के आकाश पर आज भी सूरज की तरह चमकता है. त्रिलोक ने जोर देकर कहा, म्हणता इस बात में नहीं है की हमने सत्य के ज्ञान का कितना असीम भंडार अपने सिर पर लाद रखा है. अपितु महानता इसमे है की हम धर्म का पालन कितना करते है. सत्य मार्ग के राही को मार्ग में बाधाएं आती तो है पर संकल्पशक्ति यदि दृढ़ है तो मार्ग की बाधा भी राधा बन जाती है.जैसे हम शरीर वस्त्र आदि की सफाई नित्य करते है, ऐसे ही संसार के बुरे वातावरण के काम, क्रोध, मद लोभ की धूल को आत्मा रूपी दर्पण से साफ करने के लिए सत्संग अवश्य करना चाहिए.
सत्य का उपासक ही महावीर बनता है
त्रिलोक ने श्रावक हृदय को झकझकोरते हुए कहा- पद प्रतिष्ठा एवं सत्ता का संघर्ष व्यक्ति को सत्य से दूर रखता है. इसलिए सत्ता नहीं सत्य का उपासक ही महावीर बनता है. अतः हमे चाहिए हित, मितप्रिय वजन नहीं बोले और मानवीय आत्मीय सबंधो में प्रेम की मिश्री घोले. जैसे हम भोजन मधुर एवं मृदु से प्रारंभ कर मधुर पर ही पूर्ण करना चाहिए. क्योंकि श्रेष्ठ कार्यो की प्रशंसा सुनने के बाद अपनी आलोचना सुनना भी जीवन की राह दिखाती है. कार्यक्रम प्रवक्ता सुकमाल जैन के अनुसार घटाटोप अंधेरे को भेदती सूरज की पहली किरण की तरह आनंददाई ब्र. त्रिलोक की अमृत वाणी को सुनने हर उम्र के लोग सभा की ओर उत्साह एवं उमंग के साथ पहुंच रहे है. श्रोताओं के चेहरों को देखकर लगता है कि कषायों एवं पापों के घनघोर अंधेरों के बीच उन्हें रोशनी की एक किरण मिल गई. संगीत के साथ पूजन भक्ति एवं जिनवाणी स्तुति से श्रद्धालुओं के ह्रदय में धर्म का जय घोष हो रहा है.
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