Published On : Wed, Jul 30th, 2014

आखिर बैकफुट पर क्यों है महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ?


मुंबई
के भरोसे ही तो प्रधानमंत्री बने हैं गुजरात के सीएम 

CM-nagpurनागपुर टुडे. 

जिस मुंबई के भरोसे गुजरात लगातार आगे बढ़ रहा है, वही मुंबई महाराष्ट्र का अभिन्न अंग है. इसी मुंबई के भरोसे गुजरात का मुख्यमंत्री इतना ज्यादा प्रभावी-सक्षम हो गया कि सबका चहेता बन देश का प्रधानमंत्री तक बन गया. मगर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का, सिर से लेकर धड़ तक, किसी का चहेता नहीं बन पाना विडम्बना नहीं तो और क्या है. यह दुःख व्यक्त करनेवाले और कोई नहीं, बल्कि नागपुर जिले के कांग्रेस के पूर्व पालकमंत्री हैं.

विरोध होना लाजिमी है मुख्यमंत्री का      

‘नागपुर टुडे’ से बात करते हुए इस पूर्व पालकमंत्री का दुःख बार-बार छलकता रहा.

बोले, मुंबई में गुजराती समुदाय के अधिकांश नागरिक अपना कार्यालय खोलकर बैठे हैं. वे यहां सुई से लेकर हाथी तक का धंधा करते हैं. सारा कारोबार मुंबई कार्यालय की मार्फ़त करते हैं, लेकिन अपना विकास, अपनी संपन्नता सब गुजरात में दिखाते हैं. मानो इसमें मुंबई और महाराष्ट्र का कोई योगदान ही न हो. किसी भी मामले में जब श्रेय देने का वक़्त आता है तो गुजराती समुदाय शत-प्रतिशत श्रेय गुजरात को देता है, महाराष्ट्र या मुंबई को नहीं. यही वास्तविकता है. इसी श्रेय की वजह से गुजरात का मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आज देश का प्रधानमंत्री बना बैठा है. दूसरी ओर, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को मुंबई जैसे उन्नत क्षेत्र की न तो कौड़ी भर की फ़िक्र है और न ही क़द्र. ऐसे में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का सम्पूर्ण महाराष्ट्र में विरोध होना लाजिमी है.

मुख्यमंत्री कर रहे मुंबईविदर्भ को नज़रअंदाज     

जिले के इस पूर्व पालकमंत्री का कहना था, अक्तूबर में राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. संभवतः अक्तूबर के तीसरे सप्ताह में चुनाव हो सकते हैं. कांग्रेस का इतिहास देखें तो मुंबई विभाग और विदर्भ प्रदेश कांग्रेस का गढ़ रहा है. कांग्रेस को जब भी सत्ता मिली, इन्हीं क्षेत्रों की बदौलत मिली है. यह खुली किताब की तरह है, फिर भी मुख्यमंत्री इन दोनों क्षेत्रों को नज़रअंदाज कर पश्चिम महाराष्ट्र पर कुछ ज्यादा ही ध्यान दे रहे हैं, उस पर मेहनत कर रहे हैं.समय अभी भी हाथ से निकला नहीं है.

मुख्यमंत्री के साथ ही कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं ने अगर मुंबई और विदर्भ पर बारीकी से ध्यान दिया तो पुनः सत्ता में आने से कांग्रेस को कोई नहीं रोक सकता.

इसमें उम्मीदवारों के चयन से लेकर तो कार्यकर्ताओं और जनता पर ध्यान देना तथा पिछले 10 सालों में जनहित में किए गए कार्यों की सही ढंग से मार्केटिंग करना शामिल है. वैसे भी, पश्चिम महाराष्ट्र में उंगलियों पर गिनने लायक सीटें ही कांग्रेस के पाले में आती हैं.

बुजुर्ग नेताओं का अपमान करने से बाज आएं 

इस नेता ने बातचीत में आगे कहा कि, आज युवकों का जमाना है, लेकिन मुख्यमंत्री के साथ ही कांग्रेसी नेताओं को युवाओं के नाम पर बुजुर्ग कॉंग्रेसी नेताओं का अपमान करने से बाज आना चाहिए. जब मुख्यमंत्री-कांग्रेसी नेता बुजुर्ग कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं का सम्मान नहीं कर सकते, तो उनका अपमान करने का उन्हें क्या अधिकार है. अगर युवा नेता सक्षम है तो सर्वसम्मति से युवा वर्ग को आगे किया जाए, लेकिन सक्षम बुजुर्ग कांग्रेसी नेता की कीमत पर नहीं. इससे कांग्रेस का नुकसान तो होगा ही, उसके सामने सत्ता खोने के अलावा और कोई चारा भी नहीं बचेगा.

टिकट की खरीदीबिक्री प्रथा को अविलंब समाप्त करें 

उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अब टिकट की खरीद-बिक्री प्रथा पर अविलंब रोक लगाना होगा. कांग्रेस का टिकट चाहने वाले नेताओं की बहुत साफ मंशा रहती है. और वह यह कि, 10-20 लाख रुपए देकर टिकट खरीदो.पार्टी चुनावी फंड के रूप में सभी उम्मीदवारों को 25-50 लाख रुपया देती ही है. और अगर विपक्ष मजबूत रहा या बड़ा आसामी मुकाबले में निकल आया तो 50 लाख अथवा एक करोड़ में समझौता कर हार जाओ. उम्मीदवार का गणित तो बन जाता है. 20 लाख खर्च कर मात्र 2-3 माह में 1 करोड़ की कमाई कहां होती है. लेकिन पार्टी का नुकसान जरूर हो जाता है.

बाहरी उम्मीदवारों को  लादा जाए

ऐसे ही धंधों और कांग्रेसी दलालों के कारण कांग्रेस की नैया लगातार डूबती जा रही है.
इस दफा भी इसी तरह कांग्रेसी टिकट के इच्छुक लोगों की भारी संख्या हर विधानसभा क्षेत्र में मिल ही जाएगी. इसलिए इस विधानसभा चुनाव में कम से कम टिकटों की खरीद-फरोख्त बंद कर सक्षम कार्यकर्ता-नेताओं को उम्मीदवार बनाया जाए. किसी भी क्षेत्र में बाहरी उम्मीदवार को न लादा जाए.

गैर विवादास्पद उम्मीदवारों के नाम अगस्त में घोषित करें        

इस दिग्गज नेता ने अंत में कहा, विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सम्पूर्ण राज्य के गैर विवादास्पद चुनावी क्षेत्रों के उम्मीदवारों की घोषणा अगस्त के दूसरे सप्ताह में कर दी जानी चाहिए. अगर इस नीति को अपनाया गया तो पूर्व, उत्तर, दक्षिण-पश्चिम और कामठी के उम्मीदवारों के नाम पहले चरण में घोषित किए जा सकते हैं.

विवादास्पद उम्मीदवारों के सन्दर्भ में भी कांग्रेस पार्टी को अविलंब निर्णय लेकर उसका निपटारा करना चाहिए, वरना ऐन वक़्त पर उम्मीदवार घोषित करने से सीट गंवाने का डर शत-प्रतिशत बना रहता है.

ये हो सकते हैं जिले के संभावित उम्मीदवार     

संभावना यह जताई जा रही है कि उम्मीदवारों के नाम दिल्ली में ही फाइनल किए जाएंगे. नागपुर जिले के उम्मीदवारों की सूची कुछ इस प्रकार हो सकती है-

पूर्व– सतीश चतुर्वेदी, अभिजीत वंजारी.  पश्चिम– राजेंद्र मुलक, विकास ठाकरे. मध्य– अनीस अहमद, हैदरअली दोसानी, जयप्रकाश गुप्ता और डॉ. राजू देवघरे. उत्तर– नितिन राऊत. दक्षिण– दीनानाथ पडोले, विकास ठाकरे, अभिजीत वंजारी और विशाल मुत्तेमवार. दक्षिण-पश्चिम– प्रफुल्ल गुड़धे पाटिल. कामठी– सुलेखा कुंभारे, सुरेश भोयर और नाना कंभाले. रामटेक– अमोल देशमुख, सुनील केदार, सुबोध मोहिते और गज्जू यादव. उमरेड– सुलेखा गुट या राजू पर्वे और मेश्राम. सावनेर– सुनील केदार या कोई अन्य नया उम्मीदवार.