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    Published On : Thu, Jan 21st, 2021
    nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

    नागपुर हाईकोर्ट : भारतीय निर्वाचन आयोग को नोटिस, मेडिकल छात्र को मिली राहत

    नागपुर: चंद्रपुर जिले के कोरपना तहसील की मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप लगाती एक रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने भारतीय निर्वाचन आयोग को प्रतिवादी बना कर नोटिस जारी किया है। अभय दोहे व अन्य द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाए गए हैं कि क्षेत्र के अनेक प्रभाग की मतदाता सूची में भारी गड़बड़ियां हैं। कई ऐसे लोगों को मतदाता दर्शाया गया है, जो वहां के निवासी नहीं हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार 16 नवंबर 2020 को निर्वाचन आयोग ने प्राथमिक मतदाता सूची प्रकाशित की।

    इस पर 15 दिसंबर तक दावे और आपत्तियां मंगाई गई। नियमानुसार यह बीएलओ की जिम्मेदारी है कि वह स्थानीय मतदाता सूची सही है, यह सुनिश्चित करें। बीएलओ का यह काम है कि कौन से मतदाता क्षेत्र छोड़ कर कहीं और रहने जा चुके हैं, किन की मृत्यु हो गई है या अन्य कारणों से अब वे क्षेत्र के मतदाता नहीं है, उनके नाम हटा कर मतदाता सूची को अपडेट करें। लेकिन उक्त मामले में ऐसा नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने जब इस पर आपत्ति ली तो उनकी अर्जी खारिज कर दी गई। जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ली है। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से एड.आनंद परचुरे और भारतीय निर्वाचन आयोग की ओर से एड.नीरजा चौबे ने पक्ष रखा।

    7000 पेड़ों की कटाई का मामला
    बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने बुधवार को ईराज शेख द्वारा दायर उस जनहित याचिका का निपटारा कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता ने रेल लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी और राष्ट्रीय महामार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के प्रस्तावित अजनी ट्रांसपोर्ट हब और इंटर मॉडल स्टेशन के लिए हजारों पेड़ों की कटाई का विरोध किया था। न्या.नितीन जामदार और न्या.अनिल किल्लोर की खंडपीठ ने माना कि यह याचिका सिर्फ और सिर्फ समाचार-पत्रों में प्रकाशित खबरों की कटिंग के आधार पर दायर की गई। याचिकाकर्ता ने स्वयं इसमें कोई संशोधन नहीं किया या फिर अपने मुद्दे को समर्थन कर रहे तथ्य कोर्ट के समक्ष नहीं रखे। ऐसे में हाईकोर्ट ने जनहित याचिका का निपटारा कर दिया। लेकिन याचिकाकर्ता को जरूरी संशोधन करके दोबारा याचिका दायर करने की छूट दी गई है, हाईकोर्ट ने सरकारी विभागों को आदेश दिए हैं कि याचिकाकर्ता द्वारा आरटीआई में मांगी गई जानकारी पर वे जल्द से जल्द सूचना प्रदान करें। याचिकाकर्ता के अनुसार, अजनी रेलवे स्टेशन के पास ट्रांसपोर्ट हब और इंटर मॉडल स्टोशन बनाने के लिए करीब 7000 हजार पेड़ काटे जाने की तैयारी है। इसमें से कई पेड़ तो 100 वर्ष से भी पुराने हैं। सूचना के अधिकार में प्राप्त जानकारी के अनुसार रेल लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ने एनएचएआई के साथ करार किया है, जिसके तहत इस इंटर मॉडल के विकास और प्रबंधन का निर्णय लिया गया है। इस संबंध में एनएचएआई ने नागपुर महानगरपालिका को 2000 पेड़ काटने की अनुमति मांगी है। इस पूरे प्रोजेक्ट के लिए करीब 7000 पेड़ काटे जाएंगे। एनएचएआई ने एक निजी संस्था से इस कार्य के लिए सर्वेक्षण भी कराया है, लेकिन कोर्ट ने इस जनहित याचिका को अधूरा माना।

    निजी अस्पतालों के ऑडिट पर जवाब दे राज्य और मनपा
    बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने राज्य सरकार और नागपुर महानगरपालिका से इस बात पर स्पष्टीकरण मांगा है कि उन्होंने शहर के निजी अस्पतालों के ऑडिट करने का फैसला किस अधिकार के तहत लिया है। हॉस्पिटल एसोसिएशन नागपुर की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए कोर्ट ने प्रतिवादियों को दो सप्ताह में जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता ने इस याचिका में मनपा के 31 अगस्त और 16 सितंबर के उस आदेश को चुनौती दी है जिसके तहत मनपा ने निजी अस्पतालों के ऑडिट के लिए ऑडिटर्स की टीम गठित की है। साथ ही मरीजों को प्री-ऑडिट किए हुए बिल देने को कहा गया है।

    मामले में याचिकाकर्ता की ओर से डॉ.प्रदीप अरोरा और मनपा की ओर से एड.जैमिनी कासट ने पक्ष रखा। प्रदेश स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव ने 14 मार्च 2020 को कोविड-19 के संबंध में सर्कुलर जारी किया। आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत मनपा आयुक्त को सक्षम अधिकारी नियुक्त किया गया। 30 अप्रैल को मनपा आयुक्त ने नोटिफिकेशन जारी करके निजी अस्पतालों में इलाज की दरों पर नियंत्रण लगा दिया।

    इसके बाद भी कुछ नोटिफिकेशन जारी करके इस आदेश में परिवर्तन किया गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि उक्त सूचनाओं में कहीं भी अस्पतालों के ऑडिट का जिक्र नहीं था। लेकिन फिर भी नागपुर में निजी अस्पतालों के ऑडिट का आदेश जारी किया गया। 11 अगस्त को संगठन के सदस्य अस्पताल के प्रबंधन को ऑडिट का नोटिस जारी किया। मनपा आयुक्त ने एक टीम भेज कर अस्पताल के रिकॉर्ड टटोले, इसके बाद अन्य अस्पतालों में भी जांच की गई।

    जुर्माना लगाया गया और मरीजों को अतिरिक्त शुल्क लौटाने के आदेश दिए गए। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह सब अवैध ढंग से किया गया, क्योंकि किसी भी नियम के तहत मनपा को अस्पतालों के इस प्रकार ऑडिट का अधिकार ही नहीं है। इसके बाद 31 अगस्त को मनपा ने सभी निजी अस्पतालों को आदेश दिए कि वे मरीजों को प्री-ऑडिट बिल ही दें। 16 सितंबर को आदेश जारी करके ऑडिटर्स की एक टीम गठित की गई, जिनका काम अस्पतालों में जाकर ऑडिट और बिल की पड़ताल करना था। अपना विरोध जताने के लिए याचिकाकर्ता ने कई बार मनपा आयुक्त को पत्र लिखा, लेकिन कोई हल नहीं निकला। अंतत: संगठन ने हाईकोर्ट की शरण ली है।

    मेडिकल छात्र को राहत- प्रवेश रद्द किए जाने पर अदालत ने केंद्र व राज्य सरकार को नोटिस जारी किया

    बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने दृष्टिबाधित एमबीबीएस विद्यार्थी का प्रवेश रद्द करने पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर एक सप्ताह में जवाब मांगा है। तक उसकी सीट पर कोई नया प्रवेश देने पर भी रोक लगाई है। छात्र का नाम अनवर अहमद अंसार अहमद है। याचिकाकर्ता के अनुसार, 12 मई 2017 को अकोला शासकीय अस्पताल में उसे कम दृष्टि के कारण स्थाई दिव्यांगता प्रमाण-पत्र दिया गया था। 16 नवंबर 2020 को याचिकाकर्ता ने नीट परीक्षा उत्तीर्ण करके मुंबई के लोकमान्य तिलक मेडिकल कॉलेज के एमबीबीएस पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। लेकिन 12 जनवरी को राज्य सीईटी सेल ने उसे नोटिस दिया गया कि सीईटी सेल द्वारा निर्धारित दिव्यांगता परिक्षण केंद्रों से दिव्यांगता प्रमाण-पत्र प्रस्तुत न करने के कारण उसका प्रवेश रद्द क्यों ना किया जाएं? दावा है कि याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत पेशी या फिर ई-मेल के जरिए जवाब देना था।

    याचिकाकर्ता ने सीईटी सेल में फोन करके सूचित किया था कि वह शाम तक ई-मेल से अपना जवाब भेज रहा है, लेकिन सीईटी सेल ने 13 जनवरी को उसका प्रवेश खारिज कर दिया। कारण दिया गया याचिकाकर्ता तो सुनवाई में प्रस्तुत हुआ और न ही उसने ई-मेल से अपना जवाब भेजा। याचिकाकर्ता का दावा है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम के तहत अकोला के शासकीय अस्पताल से जारी हुआ दिव्यांगता प्रमाण-पत्र पूरी तरह वैध था। नियमानुसार मेडिकल प्रवेश के लिए किसी खास अस्पताल से प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं होती। सीईटी सेल की कार्रवाई पूरी तरह गलत है। मामला अब कोर्ट में विचाराधीन है। याचिकाकर्ता की ओर से एड.मोहम्मद अतिक ने पक्ष रखा।

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